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गलती राज्य की, तो देरी की कीमत अभ्यर्थी क्यों चुकाएँ?

यह लेख एक पक्ष का तर्क रखता है। यह कानूनी सलाह नहीं है। अपने मामले के लिए अपने अधिवक्ता से ज़रूर पूछें।

परीक्षा जनवरी 2019 में हुई थी। सूचियाँ 2020 में आईं। जो अभ्यर्थी उस समय गलत ढंग से बाहर रह गई, वह अक्टूबर 2026 में भी इंतज़ार कर रही है।

उसने कोई गलती नहीं की। तो गलती किसकी थी?

तर्क सीधा है। अगर 2020 में आरक्षण सही ढंग से लागू हुआ होता, तो ये अभ्यर्थी छह साल से पढ़ा रहे होते। देरी राज्य की गलती से शुरू हुई, और सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि ऐसी देरी की क़ीमत अभ्यर्थियों से नहीं वसूली जा सकती। पूरा घटनाक्रम टाइमलाइन वाले लेख में है।

गलती, राज्य के अपने शब्दों में

  • शिकायत यह थी कि आरक्षित वर्ग के मेधावी अभ्यर्थियों को अनारक्षित (ओपन) श्रेणी में गिनने के बजाय आरक्षित सीटों पर ही रखा गया।
  • राज्य ने माना कि आरक्षण गलत ढंग से लागू हुआ। मई 2022 में उसने हलफ़नामे में कहा कि क्षैतिज (horizontal) और ऊर्ध्वाधर (vertical) आरक्षण गलत क्रम में लगाए गए।
  • इसे सुधारने के लिए 5 जनवरी 2022 को उसने 6,800 आरक्षित अभ्यर्थियों की सूची जारी की।
  • हाईकोर्ट की दोनों पीठों ने 2020 की सूची को दोषपूर्ण माना: एकल न्यायाधीश ने 13 मार्च 2023 को, और खंडपीठ ने 13 अगस्त 2024 को।

एक गलती छह साल कैसे बन गई

तारीखक्या हुआबीता समय
अक्टूबर और नवंबर 2020दोषपूर्ण सूची पर 67,867 नियुक्तियाँशुरुआत
5 जनवरी 2022राज्य ने 6800 की सूची जारी की14 महीने
27 जनवरी 2022हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगाई: यह विज्ञापित 69,000 पदों से बाहर थी—
13 मार्च 2023एकल न्यायाधीश ने सूची रद्द की, संशोधन का आदेश दिया2 साल 4 महीने
13 अगस्त 2024खंडपीठ ने 3 महीने में नई सूची बनाने का आदेश दिया3 साल 9 महीने
9 सितंबर 2024सुप्रीम कोर्ट ने नई सूची बनाने की प्रक्रिया रोकी—
19 मई 2026राज्य ने नई सूची में आने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्त करने की पेशकश की5 साल 6 महीने
अक्टूबर 2026सुनवाई अब भी जारीलगभग 6 साल

राज्य का पहला सुधार, यानी 6800 की सूची, इसलिए नहीं टिका कि उसमें विज्ञापित पदों से ज़्यादा पद जोड़े गए थे, जिसकी कानून इजाज़त नहीं देता। जनवरी 2022 की रोक बाद में सही ठहराई गई। इसलिए दोष अदालतों का नहीं है। देरी की जड़ 2020 की मूल गलती है।

बी.एड. अभ्यर्थियों के लिए इस देरी की एक और क़ीमत थी। वे इंतज़ार कर ही रहे थे कि 11 अगस्त 2023 को बी.एड. पर कानून बदल गया। इस पर अलग लेख है: एक ही परीक्षा, एक ही डिग्री, अलग-अलग नतीजा।

"छह साल" का आँकड़ा हर अभ्यर्थी पर लागू नहीं होता। 2026 की सूची के कुछ अभ्यर्थी पहले चयनित हुए थे और उन्होंने कार्यभार ग्रहण नहीं किया था।

ऐसी देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है

State of U.P. v. Neeraj Kumar Pandey (29 जनवरी 2025, SLP(C) डायरी संख्या 18516/2019; न्या. दत्ता और न्या. मनमोहन), पैरा 11। यह भी उत्तर प्रदेश की एक शिक्षक भर्ती थी:

"the delay cannot be attributed to the successful candidates. The blame for the delay has to be squarely placed on the State."

"It would defy reason and logic if claims of candidates who have secured marks, more than the candidates who have already been appointed, are spurned for no better reason than that there has been delay in the process."

यानी देरी के लिए सफल अभ्यर्थी ज़िम्मेदार नहीं हैं, ज़िम्मेदारी सीधे राज्य की है। और जिन अभ्यर्थियों के अंक पहले से नियुक्त लोगों से ज़्यादा हैं, उनके दावे सिर्फ़ इसलिए ठुकरा देना कि प्रक्रिया में देरी हुई, तर्क के ख़िलाफ़ होगा।

अन्य फ़ैसले:

  • P. Mahendran v. State of Karnataka ((1990) 1 SCC 411): "If there had been no interim orders, the selected candidates would have been appointed much before the amendment of Rules"। उनका अधिकार "could not be defeated by subsequent amendment", यानी बाद के संशोधन से ख़त्म नहीं किया जा सकता था।
  • Rajesh Kumar v. State of Bihar ((2013) 4 SCC 690), पैरा 19: सुधारी गई मेरिट सूची में आने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्ति "shall be offered"। पहले से नियुक्त लोगों को बनाए रखा गया।
  • Gaurav Pradhan v. State of Rajasthan ((2018) 11 SCC 352), पैरा 48 और 49: गलत ढंग से बाहर रखे गए अभ्यर्थियों को नियुक्त किया गया, ज़रूरत पड़ने पर अतिरिक्त पदों के साथ, और किसी को हटाए बिना।
  • Tej Prakash Pathak (संविधान पीठ, 2024 INSC 847), पैरा 41: राज्य "cannot arbitrarily deny appointment to a selected candidate", यानी चयनित अभ्यर्थी को मनमाने ढंग से नियुक्ति से वंचित नहीं कर सकता। कारण बताने का भार राज्य पर है।

गलती सुधारने का मतलब क्या होगा

अभ्यर्थी ये माँग रहे हैं:

  • सुधारी हुई सूची।
  • मौजूदा रिक्तियों पर नियुक्ति (इनमें ST के 1,133 खाली पद और वे पद शामिल हैं जिन पर चयनित लोगों ने कार्यभार नहीं लिया), या अतिरिक्त पदों पर।
  • किसी कार्यरत शिक्षक को न हटाया जाए। यही राज्य का अपना घोषित रुख़ भी है।
  • वरिष्ठता उस तारीख़ से मिले जब उनके बैच की नियुक्ति हुई थी, जैसा Balwant Singh Narwal (2008) और C. Jayachandran (2020) में हुआ।

ये माँगें हैं। कोर्ट इन्हें मानेगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है।

दूसरा पक्ष

  • Neeraj Kumar Pandey में राहत सिर्फ़ उन अभ्यर्थियों को मिली थी जो हाईकोर्ट में पहले ही जीत चुके थे।
  • चयनित अभ्यर्थी को नियुक्ति का "no indefeasible right" है, यानी अटल अधिकार नहीं है (Tej Prakash Pathak, पैरा 41)।
  • जनवरी 2022 की रोक सही थी, क्योंकि 6800 की सूची विज्ञापित पदों से बाहर थी। इसलिए यह तर्क अदालतों के ख़िलाफ़ नहीं है।

किसी अदालत ने इस भर्ती में धोखाधड़ी नहीं पाई है। राज्य ने एक गलती मानी है, और यह लेख उसी गलती की बात करता है।

स्रोत